Saturday, September 22, 2012

मेरी ज़िन्दगी

कहने को तो वोह मेरी ज़िन्दगी थी मगर,
उसके बगैर जीना अब आम हो गया,
कहने को तो गुज़र जाती है हर शाम यूँही,
पर हर शाम का साथी अब एक ज़ाम हो गया,
कहने को तो जमती हैं महफ़िलें आज भी,
पर उन महफिलों में अब, मैं  बदनाम हो गया,
कहने को ...बस कहने को ही जी रहा हूँ अब,
मेरी ज़िन्दगी का मकसद तो नाकाम हो गया ... 

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर......
    बेमकसद ज़िन्दगी का क्या किया जाए.....

    अनु

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  2. zindagi hai...jaisi bhi hai...bas jiya jaye... :)

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  3. awesome writing :)... song on my life...GOD<3U

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